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जौनपुर : 9 दशक से अनवरत जारी हैं खानापट्टी की रामलीला , 12 अक्टूबर से होगा शुरू
जौनपुर । सिकरारा में शक्ति अर्जन व प्रदर्शन की आंधी के बीच खानापट्टी की रामलीला अपनी विशिष्टता बनाए हुए है। अपने आप में अलग इस ऐतिहासिक रामलीला की शुरुआत लगभग नौ दशक पूर्व काशी नरेश ने कराई थी, जो अब तक अनवरत जारी है। तकनीक के जमाने में भी उसी सनातन परंपरा का रूप लिए यहां की रामलीला आज भी जिदा है। यहां आधुनिकता को रंगमंच पर रंचमात्र भी प्रवेश नहीं मिल सका है। रामलीला की दीवानगी पात्रों के चयन के समय से ही बढ़ जाती है।
इस बार 12 अक्टूबर से शुरू होने वाली रामलीला के कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो नौकरी करने के लिए मुंबई, दिल्ली, गुजरात, हैदराबाद, पूना आदि शहरों में रहते हैं। जो अवकाश लेकर रामलीला का मंचन करने आ जाते हैं। राम का अभिनय करने वाले अश्विनी सिंह पूना के एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं तो तो वहीं रावण बनने वाले सत्यानंद सिंह मुंबई में भवन बनाने वाली एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। धूम्राक्ष व सुग्रीव के मंत्री प्रमोद सिंह लखनऊ से आकर अपना किरदार निभाते हैं। रावण का सेनापति बनने वाले अवनीश सिंह टोनी पूना में ग्लास कंपनी में मैनेजर के पद पर हैं। सीता की सखी, तारा, सुलोचना का अभिनय करने के लिए दिल्ली से सूरज सिंह आते हैं। सूरज बीटेक के छात्र हैं। यह सभी पात्र पितृपक्ष की समाप्ति तक गांव पहुंच जाते हैं।
आजादी के पहले से सिकरारा बाजार के समीप ताहिरपुर गांव में राजा बनारस की छावनी थी। स्थानीय लोगों के कहने पर काशी नरेश ने खर्च देकर अपनी देखरेख में रामलीला का मंचन शुरू कराया। आजादी के बाद जमींदारी प्रथा समाप्त होने पर खानापट्टी गांव निवासी बृजमोहन सिंह व उनके बड़े भाई राम लखन सिंह, ताहिरपुर से रमेश सिंह, भरतपुर से राज बहादुर सिंह, इटहवां गांव से तिलकधारी सिंह के साथ बाजार निवासी राम प्रसाद गुप्त व मदन सेठ की देख-रेख में उसी स्थान पर मंचन कार्य जारी रखा। कुछ वर्षों तक मंचन कार्य उत्साहपूर्वक चलता रहा, लेकिन कुछ सदस्यों की निष्क्रियता के चलते रामलीला बंद होने के कगार पर पहुंची तो खानापट्टी गांव निवासी बृजमोहन सिंह (जो अब नहीं हैं) अपने बड़े भाई रामलखन सिंह के सहयोग से वर्ष 1954 में गांव स्थित राधा कृष्ण मंदिर पर मंचन कार्य प्रारंभ रखा।
वर्ष 1961 में गांव में चकबंदी के दौरान रामलीला मैदान को विश्वंभरनाथ योगेंद्र आश्रम के समीप भूमि आवंटित कराकर मिट्टी का चबूतरा बनाकर मंचन कार्य शुरू करा दिया। गांव निवासी महिला बैजनाथ कुंवर ने अपने पति स्व. रामनाथ की स्मृति में वर्ष 1976 में एक विशाल पक्का मंच का निर्माण कराया। उक्त मंच जर्जर होने पर उनके पौत्र विनय सिंह ने उसे गिरवाकर मैदान के पूर्वी छोर पर एक भव्य मंच का निर्माण करा रहे हैं। उन्होंने 1995 में प्रबंधक सराय हरखू रामलीला से पुस्तक मंगाकर पांच दिन तक लीला का मंचन शुरू कराया जो अब तक अनवरत जारी है।