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Navratri 2021, Day 3: मां चंद्रघंटा की पूजा, जानिए इस दिन की तिथि, समय, महत्व, पूजा विधि और मंत्र

Navratri 2021, Day 3: मां चंद्रघंटा की पूजा, जानिए इस दिन की तिथि, समय, महत्व, पूजा विधि और मंत्र

Navratri 2021, Day 3 : नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है और श्रद्धालु माता की स्थापना कर उनकी पूजा-अर्चना कर रहे हैं. घरों और बाजारों में पूजा की रौनक साफ तौर पर देखी जा सकती है.

माता के नौ अलग-अलग स्वरूपों की इन नौ दिनों में पूजा की जाती है. भक्त माता के दर्शनार्थ मंदिरों में जाते हैं और माता का आशीर्वाद लेकर उनसे अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं.

शारदीय नवरात्रि 2021 शुरू हो गया है, और 9 अक्टूबर को भक्त इस पवित्र त्योहार के तीसरे दिन का पालन करेंगे, जो माता चंद्रघंटा को समर्पित है.

वो माता पार्वती का विवाहित रूप हैं, जैसे, भगवान महादेव से विवाह करने के बाद, माता ने अपने माथे पर आधा चंद्र सजाना शुरू कर दिया और तब से उन्हें चंद्रघंटा के नाम से भी जाना जाता है.

हिंदू मान्यता के अनुसार, शुक्र ग्रह माता चंद्रघंटा द्वारा शासित है और जो लोग नवरात्रि की तृतीया तिथि को उनकी पूजा करते हैं, उन्हें सभी बाधाओं, चिंताओं, दर्द आदि से छुटकारा मिलता है.

माता अपनी सावरी पर आती हैं, जो एक बाघिन है और महत्वपूर्ण वस्तुओं को धारण करती है्. उनके दस हाथों में जैसे त्रिशू, कमंडल, कमल, गदा, तलवार, धनुष, तीर, जप माला और अभयमुद्रा है. वो अपने माथे पर तीसरा नेत्र सुशोभित करती हैं और बहादुरी का प्रतीक हैं.


दिनांक: 9 अक्टूबर, शनिवार

शुभ तिथि शुरू: सुबह 10:48 बजे, 8 अक्टूबर

शुभ तिथि समाप्त: 07:48 सुबह, 9 अक्टूबर


हिंदू मान्यता के अनुसार, ये दिन ग्रे रंग से जुड़ा है क्योंकि ये बुराई को नष्ट करने के उत्साह और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है. साथ ही, उनके माथे पर चंद्र-घंटी की ध्वनि उनके भक्तों से सभी प्रकार की नकारात्मक आत्माओं को दूर करती है.


– सुबह जल्दी उठकर नहा लें और साफ कपड़े पहनें.

– माता चंद्रघंटा की पूजा में प्रयोग होने वाली सभी सामग्रियां जैसे चमेली के फूल, भोग आदि को इकट्ठा करें.

– माता को स्नान कराएं और उन्हें नए वस्त्र पहनाएं.

– उन्हें फूल, अगरबत्ती चढ़ाएं और तिलक करें.

– मंत्रों का जाप और माता का पाठ करें.

– आरती कर पूजा का समापन करें.


ऊं देवी चंद्रघंटायै नमः ||

पिंडजप्रवरारूढ़ा,चंडकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं,चंद्रघंटेति विश्रुता।।

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥