क्या होता है मदनोत्सव, जिसमें रति और कामदेव का प्रेम किया जाता था सेलिब्रेट, जानें पूरी,,,।
देश में सर्दी का मौसम जाने और वसंत ऋतु के आने पर मदनोत्सव मनाने की परंपरा रही है। सनातन संस्कृति में इसे प्रेम के इजहार और रिश्तों में मधुरता लाने के लिए जाना जाता है. सनातन परंपरा में मदनोत्सव को शारीरिक सुख से ज्यादा मन की भावनाओं से जोड़कर देखा गया है.धर्मशास्त्रों में प्रे मो सहज, सरल और समर्पित स्वरूप में पेश किया गया है. बसंतोत्सव या मदनोत्सव माघ माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी बसंत पंचमी से शुरू होता है. इस उत्सव को कामदेव और रति के प्रेम को समर्पित किया जाता है. वहीं, बड़ी संख्या में लोग इसे श्रीकृष्ण को समर्पित करते हैं. भारतीय साहित्य में भी मदनोत्सव का कई जगह जिक्र मिलता है।
कालिदास ने 'ऋतु संहार' में मदनोत्सव का जिक्र किया है। कामशास्त्र में 'सुवसंतक'और 'मदनोत्सव' के बारे में काफी बात की गई है. काफी समय पहले पूरे देश में बसंत के मौके पर एक महीने तक मदनोत्सव मनाया जाता था. धीरे-धीरे ये गायब होता चला गया. 'ऋतु संहार' में जिक्र है कि बसंत आते ही रमणियां गरम कपड़े उतारकर लाल रंग से रंगी चादर ओढ़ लेती हैं. हल्दी से रंगी पीली साड़ी पहनती है. वहीं, 'दशकुमारचरित' में भी इस उत्सव को काम महोत्सव कहा गया है. बसंत आते ही मौसम खिल जाता था. इसी मौके पर मदनोत्सव, कौमुदी महोत्सव या बसंतोत्सव मनाया जाता था।
साहित्य में मदनोत्सव का जमकर है जिक्र
संस्कृत नाटक 'चारुदत्त' में कामदेवोनुमान उत्सव का जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि इस मौके पर कामदेव का जुलूस निकलता था. 'मृच्छकटिकम' नाटक में बसंत सेना के इस जुलूस में हिस्सा लेने का जिक्र है. 'भविष्य पुराण' में कहा गया है कि बसंत काल में कामदेव और रति की मूर्तियां स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है. 'रत्नावली' में भी मदनोत्सव का जिक्र है. 'कुट्टनीमत' में कहा गया है कि वेश्याएं और गणिकाएं भी मदनोत्सव मनाती थीं. 'सरस्वती कंठाभरण' में कहा गया है कि इसी दिन वसंत का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था. 'मात्स्यसूक्त' और 'हरी भक्ति विलास' में भी वसंत की इसी दिन से शुरुआत मानी गई है.मान्यता है कि रति और कामदेव ने बसंत पंचमी प ही मानव हृदय में प्रेम का संचार किया था।
बसंत पंचमी पर कामदेव ने क्या किया था
धर्मशास्त्रों में काम को देवस्वरूप मानकर उनको वंदनीय कामदेव बनाया गया है। काम के देवता कामदेव की पत्नी रति हैं। कामदेव के आध्यात्मिक रूप को वैष्णव अनुयायियों ने कृष्ण का अवतार भी माना है। कामदेव का अस्त्र धनुष है। वहीं, उनके बाण फूलों से बने हुए दिखाए जाते हैं. इसका मतलब कुछ इस तरह से निकाला जाता है कि जब कामदेव किसी पर अपना बाण चलाते हैं तो वह मदहोश हो जाता है। वह सम्मोहित होकर प्रेमपाश में पड़ जाता है. कामदेव की आंखों को तीर के समान माना गया है यानी उनकी नजर जिस पर पड़ती है, उसका प्रेम जीवन सफल हो जाता है. मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम व आकर्षण भरा था।
चार्वाक मनाते थे प्रेम का उत्सव चंद्रोत्सव
भारतीय ऋषि चार्वाक 600 ईसा पूर्व मदनोत्सव आयोजित करते थे. तब भी इसका काफी विरोध होता था और कुछ लोग राजदरबार में शिकायत कर देते थे. धर्मशास्त्रियों ने इसे रोकने की काफी कोशिश की थी, लेकिन चार्वाक ने किसी की नहीं मानी. वह और उनके अनुयायी प्रेम के इस उत्सव को चंद्रोत्सव कहते थे. बाद में चार्वाक के ग्रंथों और दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया. फिर भी जैन और बौद्ध धर्मग्रंथों में उनके सूत्रों का जिक्र है. इन्हीं के जरिये चार्वाक पर काफी जानकारी सामने आई. मराठी लेखक विद्याधर पुंडलीक ने चार्वाक पर अध्ययन के बाद नाटक लिखा, जिससे चार्वाक के बारे जानकारियां मिलीं. इसी नाटक से पता चला कि वैलेंटाइन जैसा पर्व हम सदियों पहले मनाते थे।
चार्वाक और उनके अनुयायी पूरे एक महीने मनाते थे प्रेम का उत्सव चंद्रोत्सव
चार्वाक के अनुयायियों पर हमले भी हुए
विद्याधर पुंडलीक की किताब 'चार्वाक' के मुताबिक, उनके अनुयायी साल की खास ऋतु में चंद्रोत्सव पर्व मनाते थे. इसे प्रेम के उत्सव के रूप में मनाया जाता था. रातभर युवक-युवतियां साथ में नाचते-गाते थे. चार्वाक के सिद्धांतों के मुताबिक, जिंदगी के हर पल का पूरा आनंद लेना चाहिए. इसीलिए उन्हें आर्ट ऑफ जॉयफुल लिविंग का जनक भी माना जाता है. चंद्रोत्सव कई दिनों तक चलता था. इसे मित्रता और आनंद का पर्व भी माना जाता था. इस पर चार्वाक की शिकायतें अंवती के सम्राट वीरसेन से की जाती थीं. यही नहीं, चंद्रोत्सव के दौरान उनके अनुयायियों पर हमले भी हुए. हालांकि, उनके विरोधी चंद्रोत्सव को छिपकर देखते थे।